बस यूँ ही (jlt)

एक कविता यूँ ही:

जब भी तुम्हे ढूँढने चली, हाथ लगी तो सिर्फ निराशा,
जानती हूँ तुम मेरे नहीं, फिर भी है इक पगली सी आशा.
तुम्हे पता है सब कुछ, फिर कभी बोलते क्यूँ नहीं,
मेरी ज़िन्दगी में अपने प्यार का रंग, घोलते क्यूँ नहीं?
बैठी हूँ तुमसे दूर, चाहती हूँ पास आना,
तुम्हारी ऐसी कोई चाह नहीं, यह भी मैंने जाना.
एक आवाज़ तो लगा के देखो, आयुंगी दौड़ के,
यह झूठा जो संसार बुना है, पीछे छोड़ के.
तुम्हारे बारे में सोचूं तो निशब्द हो जाती हूँ,
तुम्हारे ख्यालों में मानो खो सी जाती क्यूँ?
आज फिर हुआ यूँ की भटक सी गयी,
ख्वाबों में तुम्हारे अटक सी गयी.
जब भी तुम्हे देखती हूँ अपने आँगन में,
तितलियाँ सी उड़ने लगती हैं मन में.
तुम्हारे करीबी दोस्तों में से मैं शायद नहीं,
पर क्या आती हूँ किसी भी गिनती में कहीं?
जो डोर तुमने पकड़ी ही नहीं, मुझे बांधे है क्यूँ,
ये बावरा दिल मेरा, तुम्हे चाहे है क्यूँ?

P.S.: A must read post – Unwinnable battles

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25 thoughts on “बस यूँ ही (jlt)

  1. Pingback: Tagged « Thoughtful Thoughts

  2. Wow Jani.. you write awesome poetry!
    Loved your words ..so sweet!
    जो डोर तुमने पकड़ी ही नहीं, मुझे बांधे है क्यूँ,
    ये बावरा दिल मेरा, तुम्हे चाहे है क्यूँ?

    Pyaar ka dhaaga aisa hi hi hota hai… jo tute nahi tut te… agar dil saccha hai 🙂

    Keep Writing such more…
    Take care

  3. dil se likhe gaye shabdoin main jo khobsorati aur dard hota hai, uska koi sani nahi hota…
    aur tumhari yeah kavita iss baat ka jeeta jagta udaharan hai…bas isi tarah likhti raho….

    • Thank you Vineet. To be honest, is anything just like that, ever in life…. is it not that we write what comes first from the heart and then from the brain.

    • Everything that one pens down, comes from one source… our own lives…. I’ll leave it at that.. 🙂 The rest is for you to interpret.
      Thank you for the compliment.

  4. I can call it the best poem written by you till now..
    beautiful…though painfully penned…with so many emotions…

    Nice work Janhvi….

Your thoughts are as precious as mine... do share some

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